Tuesday, March 24, 2009

मेरा मन

दूर परदेस में
एक कमरे में बंद हुए
मेरा मन

उड़ रहा है
सपनों के पंख लगाये,
कभी तुम्हारे पास
कभी उन लम्हों के पास,
जब तुम साथ थे
और जब तुम साथ होगे

इस कमरे में संजोये हुए
वो हर पल हर क्षण
कभी चहकते हुए कभी बहकते हुए
मेरा मन

साहिल पे खड़ा,
लहरों से खेलता हुआ,
ठंडी हवओं को समेटता हुआ,
जिनमे खुशबू है तुम्हारी,
शायद उन्होंने तुम्हे छुआ था

इस कमरे में समेटे हुए
तुम्हारे बदन की खुश्बू को,
महकते हुए और मुस्कुराते हुए,
मेरा मन, मेरा मन